राजस्थान में 1857 की क्रांति के कारण व परिणाम





राजस्थान में 1857 की क्रांति के कारण व परिणाम भारत का एक गौरवशाली प्रदेश है जिसके कण-कण में स्वधर्म  स्वदेश के लिए मर मिटने वाले वीर शहीदों का रक्त मिश्रित है भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता एवं संस्कृत की रक्षा के लिए इस प्रदेश का अतुलनीय योगदान रहा है राजस्थान का इतिहास अदम्य साहस मातृभूमि के प्रति त्याग बलिदान  करने की भावना से ओतप्रोत त्याग बलिदान और शौर्यपूर्ण गाथाओं का इतिहास रहा है


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राजस्थान में 1857 की क्रांति



    1857 की क्रांति के कारण


शोषणपूर्ण व विभेदकारी बर्ताव

अंग्रेजों से  संधियाँ होने पर बिखेरते व संघर्षरत राजस्थान में एक बार शांति व्यवस्था कायम हो गई परंतु राजपूत शासकों को इस ब्रिटिश संरक्षण की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी अपनी बाह्य सत्ता अंग्रेजों के हाथों में सौंपना, ब्रिटिश हुकूमत के प्रति अधीनता की नीति का पलायन करने को विवश किया गया, अंग्रेजों से सहायता का आश्वासन प्राप्त कर अनेक राजपूत शासक ब्रिटिश सत्ता के प्रति निष्ठावान बनी रहे, और ऐसा स्वाभिमानी जनता के लिए असहनीय एक कदम था, राजपूतों में अंग्रेजों के मध्य ऐसी बहुत सी संध्या हुई जिन संधियों में ऐसी धाराएं सम्मिलित थी जो इन राजपूत राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश हस्तक्षेप को अवश्यम्भावी बनाने वाली थी, यहां तक कि राजपूत राज्य में कंपनी का पोलिटिकल एजेंट रखना स्वीकार किया गया था उसका प्रभाव धीरे-धीरे इन राज्यों के आंतरिक मामलों में उत्तरोत्तर बढ़ता चला गया, और ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंटों ने ताकतवर बनकर राज्य में तानाशाह की भूमिका निभाना शुरू कर दिया जिससे जनता उग्र हो गई

आर्थिक शोषण

ब्रिटिश सरकार का राज्य में सुशासन स्थापना या अच्छे प्रशासनिक प्रबंध से कोई वास्ता नहीं था, ब्रिटिश सरकार का एकमात्र उद्देश्य था अधिकाधिक धन का दोहन करना या इकट्ठा करना जो उसने किया , एक ऐसा ही उदाहरण 1835 में स्थापित शेखावाटी ब्रिगेड का नियंत्रण तो ब्रिटिश हाथों में था परंतु उसका संपूर्ण खर्च जयपुर राज्य से वसूला जाता था,  नमक उत्पादक क्षेत्रों को भी कंपनी ने अपने अधिकार में ले लिया,  ब्रिटिश सरकार ने शोषण इस कदर किया कि न्यायालय में न्याय नाम की कोई चीज ही नही छोड़ी


आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप


 शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर अंग्रेज सरकार ने हस्तक्षेप किया डूंगरपुर की महारावल जसवंत सिंह को हटाकर वृंदावन भेज दिया गया और दलपत सिंह को डूंगरपुर का शासक बनाया गया जो कि अंग्रेजों की कठपुतली मात्र था, ऐसी और भी घटनाएं हुई इन सब घटनाओं से जनता व राजपूत शासकों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध घोर विरोधी भावनाएं उत्पन्न कर दी और वे अंग्रेजी आधिपत्य से स्वतंत्रता चाहने लगे


सामंतों के अधिकारों पर कुठाराघात

राजस्थान के शासन का महत्वपूर्ण अंग सामंत भी अंग्रेजों के विरुद्ध थी


कंपनी के अधिकारी


अंग्रेजों ने अपना नियंत्रण स्थापित करने की दृष्टि से अजमेर में एजीजी की नियुक्ति की, और इनके साथ के यह सभी अधिकारी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते थे,  राजस्थान की जनता ब्रिटिश  सर्वोपरिता के प्रतीक कंपनी के इन प्रतिनिधियों से घृणा करने लगी थी,


साम्राज्यवादी आर्थिक शोषण


1818 की संधियों के बाद अंग्रेजों की आर्थिक नीति ने राजस्थान की आर्थिक व व्यापारिक ढांचे का सर्वनाश कर दिया अंग्रेज सरकार के पारगमन व्यापार अंग्रेजी क्षेत्र के व्यापार मार्गों से किए जाने की दिशा में कार्य किए इससे राजस्थान में अंग्रेजी सामान की खपत बढ़ गई और अंग्रेजों की व्यापारिक करो से आई बढ़ गई , धीरे-धीरे इसके बाद राजस्थान से व्यापारियों का निष्कर्षण भी आरंभ हुआ

धार्मिक और सामाजिक परिदृश्य

अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्यवादी हितों के पोषण के लिए प्रत्येक परंपरागत संस्था तथा नियमों में टूटन पैदा कर दी, राजस्थान के सामाजिक ढांचे को तोड़ने का कार्य किया गया, राजस्थान के देशी राज्यों को जब यह तथ्य समझ आने लगा कि इन संधियों का एकमात्र उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सर्वोच्च सत्ता को अपने हाथों केंद्रित करना और अपनी वित्तीय स्वार्थों की सम्पूर्ति करना मात्र है तो अंग्रेज हुकूमत के प्रति एक वितृष्णा और आक्रोश का भाव उनमें जागृत होता हुआ दिखाई दिया, 1848 में लॉर्ड डलहौजी गवर्नर जनरल बनकर भारत आए उन्होंने अंग्रेजी राज्य के विस्तार व स्थायित्व की दृष्टि से एक नए सिद्धांत  { राज्यों की विलय की नीति } का सूत्रपात किया जिसमें यह व्यवस्था थी कि यदि कोई देसी राजा या नवाब बिना जीवित असली संतान के मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो उसे दत्तक पुत्र गोद लेने का अधिकार नहीं होगा तथा रियासत पर उसका परंपरागत अधिकार समाप्त माना जाएगा और उसे जब्त कर अंग्रेजों के अधिकार में ले लिया जायेगा, और इसके अलावा सेना में एनफील्ड राइफल में चर्बी लगे कारतूसो के प्रयोगों ने भारतीय सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को बुरी तरह आहत किया, 

परिणाम स्वरूप अंग्रेजी सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकने की दिशा में पहला प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सामने आया देसी राज्यों ने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में जंग लड़ने का फैसला किया 10 मई 1857 को मेरठ की छावनी से सेना ने विद्रोह कर दिया


राजस्थान में 1857 की क्रांति का प्रारंभ


नसीराबाद सैनिक छावनी में विद्रोह

 अजमेर राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता का प्रमुख केंद्र था या भारी मात्रा में गोला-बारूद सरकारी खजाना था अजमेर से बंगाल नेटिव इन्फेंट्री हटाई जाने तथा मेर पलटन को वहां नियुक्त किए जाने को लेकर 15वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सैनिकों में असंतोष बढ़ने लगा, नसीराबाद छावनी में 28 मई 1857 को 15 वी नेटिव इन्फेंट्री के सैनिकों ने तोपखाने के सैनिकों को अपनी ओर मिला कर विद्रोह कर दिया, क्रांतिकारी सैनिकों ने छावनी को तहस-नहस करने के बाद दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए


नीमच छावनी


नीमच के सैनिकों में अंग्रेजों के प्रति असंतोष था, 3 जून 1857 को नीमच के सैनिकों ने हीरा सिंह के नेतृत्व में विद्रोह किया, नीमच छावनी के कप्तान मैकडोनाल्ड ने किले की रक्षा का प्रयास किया परंतु  असफल रहा

आउवा का विद्रोह

मारवाड़ में विद्रोह का सर्व प्रमुख व शक्तिशाली केंद्र आउवा नामक स्थान था, आउवा के ठाकुर खुशाल सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह व कैप्टन हीथकोट की सेना को आउवा के निकट  बिथौडा पाली नामक स्थान पर 8 सितंबर 1857 को हराया ,  18 सितंबर 1857 को चेलावास नामक स्थान पर युद्ध हुआ इस युद्ध में जोधपुर का पोलिटिकल एजेंट मोकमैसन भी लोरेन्स के साथ था मोकमैसन मारा गया और क्रांतिकारियों ने मोकमैसन का सिर आउवा के किले के दरवाजे पर लटका दिया, ठाकुर कुशाल सिंह ने 8 अगस्त 1860 को  अंग्रेजों के समक्ष नीमच में आत्मसमर्पण किया

कोटा का विद्रोह

राजस्थान में 1857 की क्रान्ति  में कोटा का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण था , कोटा के पोलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन थे,  कोटा में जय दयाल हरदयाल एवं मेहराब खान लोगों में क्रांति की भावनाएं भर रहे थे , कोटा में 15 अक्टूबर 1857 की क्रांति का बिगुल बजा दिया एवं रेजिडेंसी को घेर लिया, क्रांतिकारियों ने मेजर बर्टन का सिर धड़ से अलग कर दिया है वह सारे शहर में खुला प्रदर्शन किया, अंग्रेजों के विरुद्ध इतना सुनियोजित एवं सूनियंत्रित संघर्ष राजस्थान में  कहीं नहीं हुआ था


1857 की क्रांति के असफलता के कारण


क्रांतिकारियों में रणनीति व कूटनीति में दक्ष सेनानायकों का अभाव था 

क्रांति भावना प्रधान क्रांति थी ने की योजना प्रधान इसमें पर्याप्त नियोजन में उचित सूझबूझ का अभाव था , 

क्रांतिकारियों के पास धन रसद व हथियारों की कमी थी

क्रांति के प्रमुख केंद्र कुछ ही थे जैसे नसीराबाद नीमच कोटा एरिनपुरा जोधपुर धौलपुर आदि इसके अलावा इन केंद्रों पर क्रांतिकारियों के मध्य समय अंतराल अधिक था जो क्रांति को दबाने के लिए पर्याप्त था 
यद्यपि 1857 की क्रांति असफल रही लेकिन यह जनमानस में स्वतंत्रता की ललक उत्पन्न करने में एक कारगर सिद्ध हुई और देश स्वतंत्र कराने की दिशा में अग्नि प्रज्वलित कर दी जो मध्यरात्रि 14 अगस्त 1947 तक चलती रही



राजस्थान में 1857 की क्रांति के महत्वपूर्ण बिंदु



●  1857 की क्रांति के प्रमुख कारण

1.  सहायक संधि की नीति  - ( Subsidiary Alliance )



● गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली द्वारा प्रारंभ की गई नीति

●  इस संधि का प्रारंभिक 1798 से 1805 के बीच हुआ

●  राजस्थान में सर्वप्रथम भरतपुर  ने 29 सितंबर 1803 ईस्वी को लार्ड वेलेजली से सहायक संधि की

2.  अधिनस्थ पार्थक्य की नीति (  Subordinate Lsolation ) - 

 इस संधि को गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग के द्वारा लागू किया गया

●  सन 1818 के अंत तक सभी रियासतों ( सिरोही को छोड़कर ) ने ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि कर ली थी

●  इन सब संधियों को कराने में चार्ल्स मटेकॉफ  व कर्नल टॉड की विशेष भूमिका रही


3.  विलय की नीति  (  Doctrine of lapse)


●  सन् 1848 में में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी द्वारा प्रारंभ की गई नीति

●  इस नीति के अनुसार किसी देश की राजा के निसंतान मर जाने पर उसकी रियासत ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दी जाती थी

 ●  सेना में एनफील्ड राइफल में चर्बी लगे कारतूस व के प्रयोग के कारण धार्मिक भावनाओं को आहत किया यह क्रांति का तात्कालिक कारण माना जाता है

●  1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सेना के विद्रोह से हुआ

●  देसी रियासतों की अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में जंग लड़ने का फैसला किया

●  उस वक्त भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग व राजस्थान के एजीजी जॉर्ज पेट्रिक्स लॉरेंस थे


राजस्थान में 1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्र

1.  नसीराबाद सैनिक छावनी में विद्रोह

●  अजमेर राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता का प्रमुख केंद्र था

2.  नीमच छावनी  -

●  3 जून 1857 को नीमच के सैनिकों ने हीरा सिंह के नेतृत्व में विद्रोह किया

●  डूंगला -  वह स्थान जहां पर नीमच से बचकर भागे हुए 40 अंग्रेज अफसर व उनके परिवार जनों को क्रांतिकारियों ने बंधक बना लिया था

3.  एरिनपुरा छावनी-  

●  21 अगस्त 1857 को छावनी के पुरबिया सैनिकों ने विद्रोह कर दिया


4.  आऊवा का विद्रोह  -

●  मारवाड़ में विद्रोह का सर्व प्रमुख केंद्र आउवा नामक स्थान था

5.  एजीजी पैट्रिक लॉरेंस -  

●  18 सितंबर 1857 को क्रांतिकारियों से पराजित हुए

6.  कोटा का विद्रोह - 

●  राजस्थान में सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कोटा का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया था

●  कोटा में जयदयाल एवं मैहराब खान के नेतृत्व में 15 अक्टूबर 1857 को क्रांति का बिगुल बजा दिया गया

●  कोटा के महाराव राम सिंह को उनके महल में नजरबंद किया गया

●  जनवरी 1858 में करौली की सेना ने आकर कोटा के महाराव को क्रांतिकारियों की नजरबंदी से मुक्त करवाया


7.  धौलपुर में क्रांति  -  


●  यह क्रांति राव रामचंद्र एवं हीरालाल के नेतृत्व में की गई

8.  ताॅत्या टोपे -  

●  तात्या टोपे पेशवा बाजीराव के उत्तराधिकारी नाना साहब का स्वामी भक्त सेवक था

●  1857 की क्रांति में वह ग्वालियर का विद्रोही नेता था

●  तात्या टोपे को नरवर के जागीरदार मान सिंह नरूका की सहायता से नरवर के जंगलों में पकड़ लिया गया था

●  18 अप्रैल 1859 को उन्हें सिप्री में फांसी दे दी गई


8.  डूँगजी जवाहर जी -


●  शेखावाटी में सर्व प्रथम स्वतंत्र संग्राम का नेतृत्व थोप पाटोदा के ठाकुर डूंगर सिंह व उनके भतीजे जवाहर सिंह शेखावत ने किया


9.  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का अंत  -


●  सितंबर अठारह सौ सत्तावन को मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को पकड़ लिया गया और दिल्ली के लाल किले में बंद कर दिया गया
●  इस प्रकार देश को गुलामी से मुक्त कराने का प्रथम प्रयास असफल रहा


10.  1857 की क्रांति का तात्कालिक प्रभाव  -


●  ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने 2 अगस्त 1858 को भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर यहां का शासन सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया

●  गवर्नर जनरल का पद नाम गवर्नर जनरल एवं वायसराय हो गया

●  भारत का प्रथम वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग को नियुक्त किया गया

●  अमरचंद बांठिया देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी पर लटकाए गए प्रथम शख्स  ने दूसरा भामाशाह भी कहते हैं

●  भारत में प्रथम सहायक संधि 1798 ईस्वी में हैदराबाद के निजाम के साथ की गई थी





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